साहित्य महापरिषद् का द्वादश वार्षिक अधिवेशन का भव्य एवं गरिमापूर्ण आयोजन जगजीवन महाविद्यालय के सभागार में महापरिषद् के अध्यक्ष डा. रामसिंहासन सिंह की अध्यक्षता में दो सत्रों में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर मगध विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. विनोद कुमार मंगलम , उद्घाटनकर्ता के तौर पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सत्येन्द्र प्रजापति एवं बी एच यू से आए प्रो. आर. एस. मौर्या एवं वि. अतिथि के तौर पर विश्वविद्यालय सेवा आयोग के सदस्य प्रो. उपेन्द्र नाथ वर्मा एवं मगध विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. आनन्द कुमार सिंह उपस्थित रहे । इस अवसर पर विभिन्न विश्वविद्यालय से जुड़े कई आचार्य , साहित्यकार सहित ढेर सारे गणमान्य लोग उपस्थित रहे । सर्वप्रथम दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरूआत की गई। उसके बाद आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की तस्वीर पर सभी उपस्थित महानुभावों ने माल्यार्पण किया । इस अवसर पर सभी उपस्थित अतिथियों को पुष्पमाला एवं अंग-वस्त्र देकर सम्मानित किया गया । इस वर्ष का प्रतिष्ठित “आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री सम्मान ” मुजफ्फरपुर के जाने-माने साहित्यकार डाॅ. संजय पंकज को प्रदान किया गया, लेकिन आकस्मिक अति आवश्यक कार्य के कारण आज उपस्थित नहीं हो पाए। जल्द ही यह सम्मान ससम्मान उन तक पहुंचा दिया जाएगा । ” भारतीय साहित्य की अवधारणा एवं वैश्विक शांति ” जैसे समसामयिक एवं आज के संदर्भ में जरूरी विषय पर गहन एवं गंभीर परिचर्चा की शुरुआत करते हुए प्रो. संगीता कुमारी ने इस विषय की गंभीरता को जिस सूक्ष्मता से उकेरा , वह बेजोड़ था । रविन्द्र नाथ टैगोर की ‘गोरा’ से लेकर धर्मवीर भारती से गुजरते हुए सर्वेश्वर दयाल की कविताओं के उद्धरण से कही कि नारी अस्मिता पर आघात, सामाजिक न्याय की अवधारणा पर चोट को भी यदि हिंसा नहीं माना गया तो फिर सामाजिक स्तर एवं वैश्विक स्तर शांति की अवधारणा को पुष्ट नहीं किया जा सकता है । इसके बाद प्रो. प्रदीप कुमार ने भारतीय साहित्य में शांति की अवधारणा को दो स्तरों आंतरिक एवं बाह्य पर निरूपित करते हुए दोनों को एक दूसरे का पूरक बताया । साथ ही विश्व शांति की अवधारणा को हिन्दी साहित्य में विभिन्न उदाहरणों से पुष्ट किया । इसके बाद मुख्य अतिथि मगध विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो .मंगलम सर जो बहुत अच्छे साहित्य मर्मज्ञ हैं , उन्होंने अज्ञेय को उद्धरित करते हुए जिस सूक्ष्म स्तर पर जाकर अहिंसा की अवधारणा को उकेरकर सामने प्रस्तुत किया , वह अद्भुत था । विषय पर गंभीरता के साथ बोलने के प्रवाह में श्रोता मग्न हो इस कदर बहते रहे कि एक घंटा कैसे बीत गया पता ही नहीं चला । इसके बाद विषय पर प्रो आर. एस. मौर्या , प्रो आनन्द कुमार सिंह, प्रो शिरोमणि सिंह, प्रो उपेन्द्र नाथ वर्मा एवं प्रलेस के अध्यक्ष कृष्ण कुमार ने भी इस विषय पर विस्तार से एवं सशक्त ढंग से अपने विचार रखें । वक्ता के साथ श्रोता भी इस गंभीर परिचर्चा में इस कदर डूब गए कि भोजनावकाश एक बजे की जगह तीन बजे करना पड़ा । सभी अतिथियों ने बिहारी व्यंजन लिट्टी-चोखा एवं मिष्ठान इत्यादि का लुत्फ उठाया । द्वितीय सत्र में कवि-सम्मेलन सह मुशायरे का आयोजन मशहूर शायर एम ए फातमी की अध्यक्षता में हुआ , जिसमें करीब एक दर्जन कवियों ने अपनी कविता का पाठ किया ।इस अवसर पर डाॅ. रामसिंहासन सिंह ने वरिष्ठ कवियों को अंग-वस्त्र देकर सम्मानित किया । कार्यक्रम की शुरुआत में ही अध्यक्ष डाॅ. रामसिंहासन सिंह ने स्वागत भाषण के दौरान ही परिचर्चा का विषय प्रवेश कराते हुए आज के विषय की सशक्त रूप रेखा रख दी थी । कार्यक्रम में महापरिषद् की त्रैमासिक पत्रिका ‘ सहयात्री’ का लोकार्पण भी हुआ। दोनों सत्रों का संचालन महापरिषद् के महामंत्री राजीव रंजन ने किया ।मौके पर संजीत बकथरिया सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।